Daily Current Affairs Quiz 27 June 2019
Daily Current Affairs Quiz 27 June 2019
June 27, 2019
Daily Current Affairs Quiz  28 June 2019
Daily Current Affairs Quiz  28 June 2019
June 28, 2019

Daily Current Affairs 27 June 2019

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[su_highlight]चीन और पाकिस्तान से भारत में प्रवेश के लिए नेपाली नागरिकों के पास वीज़ा होना अनिवार्य[/su_highlight]

हाल ही में नई दिल्ली में नेपाली एम्बेसी ने अधिसूचना जारी करके स्पष्ट किया है कि यदि कोई नेपाली नागरिक पाकिस्तान, चीन हांगकांग तथा मकाउ से भारत में प्रवेश करता है तो उसके पास वीज़ा होना चाहिए। नेपाल के विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत में 4 मिलियन नेपाली लोग काम कर रहे हैं अथवा पढ़ाई कर रहे हैं।

मुख्य बिंदु :- नेपाली दूतावास ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारत के द्वारा खाड़ी देशों में जाने वाले नागरिकों को उन देशों में स्थित नेपाली दूतावासों से अनापत्ति प्रमाणपत्र प्राप्त करना होगा। यह निर्णय सुरक्षा की दृष्टि से लिए गये हैं। शुरू में इस प्रकार के परमिट की आवश्यकता नहीं थीं।

पृष्ठभूमि :- नियमों के अनुसार नेपाल के किसी नागरिक को भारत में भूमि तथा हवाई माध्यम द्वारा प्रवेश करने के लिए पासपोर्ट और वीज़ा की आवश्यकता नहीं होती, परन्तु उसके बाद पहचान पत्र होना चाहिए, जिससे उसकी पहचान नेपाली नागरिक के रूप मे की जा सके। यदि नेपाल का नागरिक किसी अन्य स्थान से भारत में प्रवेश करता है तो सुरक्षा की दृष्टि से उसका पासपोर्ट देखा जाता है। नेपाली नागरिक की पहचान के लिए मान्य दस्तावेज़ हैं : पासपोर्ट, नेपाली नागरिकता प्रमाणपत्र, मतदाता पहचान पत्र इत्यादि।


[su_highlight]बिहार सरकार ने पेड़ काटने पर रोक लगाई[/su_highlight]

बढ़ते हुये प्रदूषण तथा जानलेवा ग्रीष्म लहर के कारण बिहार सरकार ने हाल ही में राज्य के विभिन्न शहरों में पेड़ों के काटने पर रोक लगा दी है

मुख्य बिंदु :- बिहार के प्रमुख शहर विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में आते है, पटना (7वां स्थान), मुजफ्फरपुर (13वां स्थान), गया (18वां स्थान) तथा भागलपुर में प्रदूषण काफी बड़ी समस्या है। वर्तमान में बिहार में पेड़ सुरक्षा अधिनियम नहीं है, इसलिए लोग अपने निजी पेड़ों को काट रहे हैं। पेड़ों की कटाई पर रोक के मौजूदा आदेश को वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत जारी किया गया है।

बिहार सरकार ने सरकारी परियोजनाओं के लिए पेड़ों के कटान पर रोक लगा दी है। यदि किसी विकास कार्य (जैसे सड़क अथवा उच्चमार्ग) के लिए पेड़ काटने की आवश्यकता पड़ती है तो उस पेड़ अथवा प्रोजेक्ट को शिफ्ट करना पड़ेगा। इंजीनियरों को पेड़ न काटने की हिदायत दी गयी है। विकास कार्यों के लिए पेड़ काटने के आदेश अब अमान्य हो गये हैं। हालांकि यह आदेश केवल सरकारी स्वामित्व वाली भूमि पर लागू होता है, लोग अपनी निजी भूमि पर पेड़ को काट सकते हैं, क्योंकि बिहार में पेड़-सुरक्षा अधिनियम नहीं है। मौजूदा सरकार ने हरित कवर को 17% तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। बिहार “ग्रीन मिशन” के तहत हरित कवर को 7% से 15% तक बढ़ाने में कामयाब रहा है।

वन संरक्षण अधिनियम, 1980 :- वन संरक्षण अधिनियम, 1980 को भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया था, इसका उद्देश्य वनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इस अधिनियम के अनुसार वन भूमि का उपयोग गैर-वनीय उद्देश्य के लिए करने के लिए केंद्र सरकार की अनुमति आवश्यक है।


[su_highlight]सार्वजनिक खरीद नीति  [/su_highlight]

स्रोत (Source): द हिंदू, In the absence of good law

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने निविदाओं के निर्णय के विरुद्ध रिट दायर करने के मामलों में वृद्धि के संदर्भ में अपनी चिंता व्यक्त की है। छोटे निविदा हो या बड़े निविदा लगभग प्रत्येक निविदा के मामले में अब रिट दायर करना सामान्य हो गया है।

समुचित कानून का अभाव :- कोर्ट के समक्ष निविदाओं के संदर्भ में रिट दायर होने का कारण इस संदर्भ में अपर्याप्त कानूनों समेत एक राष्ट्रीय सार्वजनिक खरीद कानून का नहीं होना हैं। भारत को सार्वजनिक खरीद नीति के लिए अभी संसदीय कानून को बनाना शेष है।

सरकार के द्वारा लगभग सकल घरेलू उत्पाद के 30% के बराबर खरीद की जाती है। राजकोषीय रूप से इतने महत्वपूर्ण होने के बावजूद अभी तक इसके लिए कोई व्यापक कानून को अपनाया नहीं गया है। भारत में सार्वजनिक खरीद की नीति मात्र नियमों,दिशानिर्देशों और नियमों के एक चक्रव्यूह में सिमटकर रही गयी है।

अतीत में सार्वजनिक खरीद में भ्रष्टाचार के आरोपों ने निर्वाचित सरकारों को सत्ता से बेदखल कर दिया है।

वर्तमान में चल रही सभी प्रक्रियाएं में पारदर्शिता एवं कुशलता का अभाव है। ऐसे परिदृश्य में सार्वजनिक खरीद को विनियमित करने एवं पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक यथोचित संसदीय कानून की आवश्यकता है।

सरकार ने इस क्षेत्र से संबंधित मुद्दों को संबोधित करने हेतु 2012 में लोकसभा में सार्वजनिक खरीद विधेयक प्रस्तुत किया गया जिसका उद्देश्य ” सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता,जवाबदेही और सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करना था”। दुर्भाग्य से यह विधेयक यह संसद द्वारा पारित नहीं किया गया।

2015 में तात्कालिक सरकार के द्वारा सार्वजनिक खरीद विधेयक 2015 प्रस्तुत किया गया जिसमें 2012 के प्रस्तावित विधेयक के सुधारों को भी शामिल किया गया था। परंतु यह भी अव्यवस्था का शिकार हो गई।

प्रस्तुत किए गए दोनों विधेयकों में सार्वजनिक खरीद की शिकायतों के संदर्भ में मजबूत आंतरिक मशीनरी का प्रावधान किया गया था किंतु इन विधेयकों का कार्यान्वयन नहीं हो सका। ऐसी पृष्ठभूमि में सार्वजनिक निविदा के निर्णय को अदालतों में चुनौती देना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है।

सार्वजनिक खरीद नीति के संदर्भ में संवैधानिक प्रावधान भी अपर्याप्त है। अनुच्छेद 282 सार्वजनिक व्यय में वित्तीय स्वायत्तता का प्रावधान तो करती है लेकिन सार्वजनिक खरीद के सिद्धांतों, नीतियों, प्रक्रियाओं या शिकायत निवारण के संदर्भ में कोई दिशानिर्देश प्रदान नहीं करती।

राज्यों में समुचित कानून का अभाव

राज्य के सार्वजनिक खरीद को विनियमित करने एवं विवादों के लिए समाधान तंत्र की स्थिति राज्यों में भी अच्छी नहीं है।

राज्य के अधिनियम के द्वारा मात्र पांच राज्यों में सार्वजनिक खरीद की जाती है: तमिलनाडु, कर्नाटक, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और असम। इन अधिनियमों में शिकायत निवारण तंत्र ना ही स्वतंत्र है एवं ना ही प्रभावी।

मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधिकरण को प्रभावशाली रूप में कार्य करने हेतु कुछ प्रभावपूर्ण वैकल्पिक उपायों के दिशा निर्देश दिए गए।

इसके अंतर्गत अनुच्छेद 226 में वर्णित ‘प्रभावकारी’ शब्द पर सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा बल प्रदान किया गया था। किंतु दुर्भाग्य से न्यायाधिकरण में इन वैकल्पिक उपायों का अभाव है।

निविदाओं को अदालतों में चुनौती दिए जाने पर अदालतों ने न्यायिक समीक्षा के द्वारा केस-दर-केस कड़े प्रतिबंध लगाए गए, जिससे हस्तक्षेप की गुंजाइश बहुत ही सीमित हो गई है। खरीद अधिकारी को न्यायिक सिद्धांतों द्वारा सशक्त किया जाता है जिसमें कम कानून के साथ जवाबदेही भी कम होती है।

अदालतों के द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों और शिकायतों के निवारण के लिए प्रभावकारी तंत्र की अनुपस्थिति से सार्वजनिक खरीद से जुड़े नकारात्मक पहलुओं को प्रोत्साहित करेंगे।

इस तरह के निराशाजनक कानूनी परिदृश्य में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि सार्वजनिक खरीद निविदा के निर्णय को अक्सर संवैधानिक अदालतों में चुनौती दी जाती है।

जब तक कोई प्रभावी विकल्प उपलब्ध नहीं करवाए जाते तब तक ऐसे मामले न्यायालयों के समक्ष आते रहेंगे।


[su_highlight]भारतीय एयरलाइंस ने ईरान के एयरस्पेस का इस्तेमाल बंद किया[/su_highlight]

भारत की सभी एयरलाइंस ने डीजीसीए (डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन) के साथ परामर्श के बाद ईरान के एयरस्पेस में न जाने का फैसला किया है. इससे पहले दुनिया की कई एयरलाइंस ईरानी एयरस्पेस में न जाने का ऐलान कर चुकी हैं.

पाकिस्तान के बालाकोट में भारतीय वायु सेना की कार्रवाई के बाद से अब तक पाकिस्तान एयर स्पेस भी पूरी तरह बंद है. ऐसे में दक्षिण एशिया से पश्चिमी देशों का रास्ता और लंबा हो जाएगा.

फारस की खाड़ी से सुरक्षित निकालने के लिए ऑपरेशन ‘संकल्प शुरू’ किया

भारतीय नौसेना ने फारस की खाड़ी से गुजरने वाले जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए ऑपरेशन ‘संकल्प शुरू’ किया है. ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के मद्देनजर भारत के जरिए इस ऑपरेशन की शुरुआत की गई है. इस ऑपरेशन के तहत भारतीय नौसेना के युद्धपोतों को फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी और होरमुज-स्ट्रेट से गुजर रहे भारत के जहाजों को सुरक्षित वहां से निकालने की जिम्मेदारी दी गई है. इसके लिए INS चेन्नई और INS सुनयना को ओमान की खाड़ी में तैनात किया गया है. ताकि वहां से गुजरने वाले सभी भारतीय जहाज सुरक्षित अपने देश लौट सकें.

क्या है मामला? :- 20 जून 2019 को ईरान ने अमेरिका के एक ड्रोन ‘RQ-4A ग्लोबल हॉक’ को मार गिराया था. अमेरिका ने कहा कि इस घटना के बाद उसने ईरान पर सीमित हमले की योजना बनाई थी लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया. इसके बाद से दोनों देशों के बीच तनाव अपने चरम पर है. इससे पहले अमेरिकी सेना ने ओमान की खाड़ी में 13 जून को तेल के दो टैंकरों पर हमले के लिए ईरान पर आरोप लगाया था.


[su_highlight]जी एस टी परिषद की 35 वीं बैठक[/su_highlight]

जी एस टी परिषद की 35 वीं बैठक  21 जून, 2019 को नई दिल्ली में आयोजित की गई। यह केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के तहत जीएसटी परिषद की पहली बैठक थी, जिसने जीएसटी नियमों के सरलीकरण और जीएसटी दर के दायरे में अधिक वस्तुओं को लाने की बात की।

हालांकि परिषद ने इलेक्ट्रिक वाहनों पर कर स्लैब को 12 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करने पर विचार किया, लेकिन यह निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सका। इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए जीएसटी दर में कटौती के इस मामले को और अधिक विचार के लिए फिटमेंट कमेटी को भेजा गया था।

जीएसटी परिषद की बैठक के दौरान जिन अन्य विषयों पर चर्चा की गई उनमें कर चोरी का मुद्दा, इलेक्ट्रॉनिक चालान प्रणाली, राज्यों की राजस्व स्थिति, नई जीएसटी रिटर्न फाइलिंग प्रणाली, राष्ट्रीय मुनाफाखोरी विरोधी प्राधिकरण के कार्यकाल का विस्तार और अन्य शामिल थे।

परिषद ने पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक अपीलीय न्यायाधिकरण स्थापित करने और सभी केंद्र शासित प्रदेशों (संघ शासित प्रदेशों) के लिए एक अन्य न्यायाधिकरण स्थापित करने पर भी विचार-विमर्श किया।

बैठक में लिए गए कुछ अहम फैसले :-

  • मल्टीप्लेक्स के लिए ई-टिकटिंग अनिवार्य कर दिया
  • जनवरी 2020 तक सभी के लिए नए एकल जीएसटी रिटर्न फॉर्म को रोल आउट करें
  • राष्ट्रीय मुनाफाखोरी निरोधक प्राधिकरण (NAA) का कार्यकाल 2 वर्षों के लिए बढ़ाया गया
  • NAA के दंड प्रावधानों ने और अधिक कठोर बना दिया
  • वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क (GSTN) में पंजीकरण के लिए स्वीकृत आधार का उपयोग
  • माल की आवाजाही पर नज़र रखने के लिए एनएचएआई के फास्टैग तंत्र के लिए जीएसटी ई-वे बिल प्रणाली

[su_highlight]पारंपरिक हलवा समारोह[/su_highlight]

बजट दस्तावेजों की छपाई के साथ ही इस सप्ताह के अंत में प्रथागत ‘हलवा समारोह’ हुआ। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 5 जुलाई, 2019 को नई नरेंद्र मोदी सरकार के लिए पहला बजट पेश करेंगी। इसके अलावा, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 45 अर्थव्यवस्था विशेषज्ञों के साथ बैठक की और रोजगार, कृषि, जल संसाधन, निर्यात, शिक्षा के बारे में चर्चा की। स्वास्थ्य आदि

स्वीट डिश का महत्व यह है कि इसे परोसे जाने के बाद, बड़ी संख्या में अधिकारी और सहायक कर्मचारी, जो सीधे बजट बनाने और मुद्रण प्रक्रिया से जुड़े होते हैं, को मंत्रालय में रहने और अपने परिवार से, लोकसभा में वित्त मंत्री द्वारा बजट की प्रस्तुत करने तक दूर रहना आवश्यक होता है । उन्हें फोन या संचार के किसी भी अन्य माध्यम,जैसे ई-मेल, से अपने निकट और प्रिय लोगों से संपर्क करने की अनुमति नहीं होती है।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 20 जून, 2019 को संसद के संयुक्त बैठक को संबोधित किया। उन्होंने अगले पांच वर्षों के लिए मोदी सरकार के लक्ष्यों को रेखांकित किया। राष्ट्रपति कोविंद ने मोदी सरकार द्वारा देश के विकास के लिए किए गए विभिन्न प्रयासों और पहलों पर प्रकाश डाला।

केंद्रीय बजट 5 जुलाई 2019 को लोकसभा में पेश किया जाएगा। हालांकि, वार्षिक वित्तीय स्नैपशॉट को पेश करने के लिए, भारत का आर्थिक सर्वेक्षण बजट पेश करने से एक दिन पहले पेश किया जाएगा।

इससे पहले फरवरी में आर्थिक सर्वेक्षण प्रस्तुत नहीं किया गया था क्योंकि यह अंतरिम बजट था। संसद का बजट सत्र 17 जून, 2019 से शुरू हो चुका है और यह 26 जुलाई, 2019 तक चलेगा।


[su_highlight]केंद्र सरकार 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र स्थापित करेगी[/su_highlight]

कृषि और किसान कल्याण मंत्री, नरेंद्र सिंह तोमर ने घोषणा की कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के लिए ग्रामीण भारत में डिजिटल प्रौद्योगिकी का उपयोग करने का निर्णय लिया है। इसके लिए, सरकार ने कृषक समुदाय के बीच प्रौद्योगिकियों के प्रसार के लिए देश में जिला स्तर पर 713 कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) और 684 कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसियों(एटीएमए) की स्थापना की है।

प्रमुख बिंदु:
i. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बिग डेटा एनालिटिक्स, और ब्लॉक चैन टेक्नोलॉजी, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओंटी), आदि ऐसी तकनीकें हैं जिनका उपयोग किया जाएगा।
ii. अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी कृषि उत्पादन, कृषि-मौसम विज्ञान और भूमि आधारित अवलोकन, बागवानी मूल्यांकन और प्रबंधन, सूखा मूल्यांकन और निगरानी प्रणाली का पूर्वानुमान लगाने में मदद करती है।
iii. सरकार ने एक अंतर-मंत्रिस्तरीय समिति का गठन किया है और 2022 तक लक्ष्य हासिल करने की रणनीति का सुझाव दिया है।
iv. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा लगभग 100 मोबाइल एप्लिकेशन संकलित किए गए हैं जो राज्य के कृषि विश्वविद्यालयों, आईसीएआर और कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा विकसित है और ये किसानों को एसएमएस के माध्यम से फसल संबंधी सलाह भेजने के लिए खेती के बारे में बहुमूल्य जानकारी प्रदान करेंगे।
v. इसके अलावा, प्रचार अभियान, किसान कॉल सेंटर, कृषि-क्लिनिक और उद्यमियों के कृषि-व्यवसाय केंद्र, कृषि से संबंधित प्रदर्शनी, किसान एसएमएस के माध्यम से किसानों को जानकारी दी जाएगी।


[su_highlight]जापान ने इम्फाल पीस म्यूजियम मणिपुर को उपहार में दिया[/su_highlight]

जापान ने मणिपुर को इम्फाल की लड़ाई की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर मणिपुर को इम्फाल पीस म्यूज़ियम उपहार में दिया, जो कि द्वितीय विश्व युद्ध के भयंकर युद्ध में से एक है, जो माबाम लोकपा चिंग में हुआ जिसे लोकप्रिय रूप से लाल पहाड़ी (इंफाल के लगभग 20 किमी दक्षिण पश्चिम में) के रूप में जाना जाता है। उद्घाटन में मणिपुर के राजस्व मंत्री करम श्याम, भारत में जापानी राजदूत केनजी हिरामात्सु, यूनाइटेड किंगडम के उच्चायुक्त डोमिनिक अक्विथ और टीएनएफ के अध्यक्ष योही ससाकावा शामिल थे।
प्रमुख बिंदु:
i. यह द निप्पॉन फाउंडेशन (टीएनएफ) नाम के जापान में स्थित एक निजी, गैर-लाभकारी अनुदान-निर्माण संगठन द्वारा वित्त पोषित है।
ii. संग्रहालय जापान और ब्रिटेन और जापान और भारत के बीच सामंजस्य का प्रतीक है। यह एक संदेश के साथ भयंकर युद्ध की जीवित स्मृति के रूप में कार्य करेगा जो इतिहास को बदलता है और इससे दुनिया को अतीत से सीख लेनी चाहिए।
iii. संग्रहालय का मुख्य आकर्षण जापान के प्रधान मंत्री शिंजो आबे द्वारा जापानी में ‘हेइवा’ शब्द या ‘शांति’ के साथ तैयार की गई सुलेख है, जिसका अर्थ है शांतिपूर्ण भविष्य के लिए एक असीम आशा।
1944 की इम्फाल की लड़ाई के बारे में:
इम्फाल की लड़ाई मार्च से जुलाई 1944 तक इम्फाल (मणिपुर की राजधानी) शहर के आसपास के क्षेत्र में हुई। जापानी सेनाओं ने इम्फाल पर भारत में मित्र देशों की सेना को नष्ट करने के प्रयास के साथ हमला किया, लेकिन उन्हें बर्मा (म्यांमार) में भारी नुकसान के साथ लौटा दिया गया। इम्फाल की लड़ाई के साथ होने वाली सड़क पर कोहिमा की लड़ाई (जिसे पूर्व का स्टेलिनग्राद भी कहा जाता है) जिसमें इम्फाल में मित्र देशों की घिरी सेनाओं को राहत मिली थी, द्वितीय विश्व युद्ध के बर्मा अभियान का मुख्य मोड़ था। सुभाष चंद्र बोस की भारतीय राष्ट्रीय सेना (आईएनए) के साथ लगभग 70,000 जापानी सैनिक इम्फाल और कोहिमा के आसपास के क्षेत्रों में ब्रिटिश नेतृत्व वाली मित्र सेना के साथ लड़ाई में शहीद हो गए। इन लड़ाइयों में से अंतिम युद्ध इंफाल की लाल पहाड़ी में लड़ा गया था।


[su_highlight]आरबीआई ने नया शिकायत पोर्टल लॉन्च किया[/su_highlight]

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने आरबीआई की वेबसाइट पर बैंकों और एनबीएफसी (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों) के खिलाफ शिकायत दर्ज करने के लिए एक शिकायत प्रबंधन प्रणाली (सीएमएस) शुरू की है। ऑनलाइन पोर्टल का उद्देश्य शिकायतों के समय पर निवारण में ग्राहकों के अनुभव में सुधार करना है।
प्रमुख बिंदु:
i. सीएमएस, एक सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन जो डेस्कटॉप के साथ-साथ मोबाइल उपकरणों पर उपलब्ध है, ऑनलाइन फाइल करने के लिए डिज़ाइन किया गया है और यह ग्राहकों के मोबाइल नंबरों पर सीधे प्राप्ति सूचना रसीद भेजता है।
ii.जनता पोर्टल (https://cms.rbi.org.in) का उपयोग सार्वजनिक इंटरफेस जैसे वाणिज्यिक बैंकों, शहरी सहकारी बैंकों, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के साथ किसी भी विनियमित इकाई के खिलाफ शिकायतों को दर्ज करने के लिए कर सकती है, जिसे आरबीआई के लोकपाल / क्षेत्रीय कार्यालय के उपयुक्त कार्यालय को निर्देशित किया जाए।
iii. आरबीआई ने शिकायतों की स्थिति पर नज़र रखने के लिए एक समर्पित इंटरएक्टिव वॉयस रिस्पांस (आईवीआर) प्रणाली शुरू करने की योजना बनाई है।
iv. आरबीआई के बैंकिंग लोकपाल (बीओ) और उपभोक्ता शिक्षा और संरक्षण प्रकोष्ठों (सीईपीसी) के कार्यालयों में सीएमएस के शुभारंभ के साथ शिकायतों के प्रसंस्करण को डिजिटल किया गया है।


[su_highlight]‘बम्बल’ अंतरिक्ष में अपनी शक्ति के तहत उड़ान भरने वाला पहला एस्ट्रोबी रोबोट बन गया[/su_highlight]

14 जून, 2019 को, नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) का एस्ट्रोबी रोबोट ‘बम्बल’ अंतरिक्ष में अपनी शक्ति के तहत उड़ान भरने वाला पहला एस्ट्रोबी रोबोट बन गया। यह शोधकर्ताओं को शून्य गुरुत्वाकर्षण में नई तकनीकों की जांच करने और अंतरिक्ष यात्रियों को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) में नियमित कार्य करने में सहायता करने में मदद करेगा।
प्रमुख बिंदु:
i. ’बम्बल’ और ‘हनी’ नामक एक दूसरे एस्ट्रोबी को अप्रैल 2019 में अंतरिक्ष स्टेशन में लॉन्च किया गया था।
ii. ’क्वीन’, एक तीसरा रोबोट, जुलाई 2019 में लॉन्च किया जाए


[su_highlight]उत्तर पूर्वी परिषद[/su_highlight]

 केंद्र ने उत्तर पूर्वी परिषद के समाचार पत्र का तीसरा अंक जारी किया।

NEC के बारे में:

  • पूर्वोत्तर राज्यों के साथ संतुलित और समन्वित विकास करने और समन्वय को सुविधाजनक बनाने के लिए पूर्वोत्तर क्षेत्र परिषद अधिनियम, 1971 के तहत परिषद की स्थापना की गई ।
  • 2002 के संशोधन के बाद, पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए एक क्षेत्रीय योजना निकाय के रूप में कार्य करने के लिए एनईसी को अनिवार्य किया गया है और इस क्षेत्र के लिए एक क्षेत्रीय योजना तैयार करते समय , दो या दो से अधिक राज्यों को लाभ देने वाली योजनाओं और परियोजनाओं को प्राथमिकता देगा, बशर्ते कि सिक्किम के मामले में, परिषद उस राज्य के लिए विशिष्ट परियोजनाओं और योजनाओं का निर्माण करेगी।
  • केंद्रीय मंत्रिमंडल जून 2018 में, के नामांकन के लिए पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास (स्वतंत्र प्रभार) के मंत्रालय के प्रस्ताव को मंजूरी दी पूर्वोत्तर परिषद के पदेन अध्यक्ष (एनईसी) के रूप में केंद्रीय गृह मंत्री । मंत्रिमंडल ने यह भी मंजूरी दी कि राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), DoNER मंत्रालय परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में काम करेगा ।
  • पूर्वोत्तर राज्यों के परिषद और सभी राज्यपाल और मुख्यमंत्री सदस्य होंगे ।

    [su_highlight]FALL ARMYWORM (FAW)[/su_highlight]

    देश में FAW का इन्फेक्शन मुख्य रूप से मक्का ,रागी और सोरहुम पर काफी हद तक पाया गया है।

FAW क्या है?

एक अमेरिका के उष्णकटिबंधीय और उप उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के मूल रूप से पाया जाता है , यह पहले 2016 में अफ्रीकी महाद्वीप में पाया । तब से, यह चीन, थाईलैंड, मलेशिया और श्रीलंका जैसे अन्य देशों में फैल गया है।  यह भारत में पिछले साल पहली बार रिपोर्ट किया गया था, जब उसने कर्नाटक में फसलों को प्रभावित किया था। केवल छह महीने के भीतर, देश के लगभग 50 फीसदी, जिनमें मिजोरम, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात और पश्चिम बंगाल शामिल हैं, ने एफएडब्ल्यू प्रभाव की सूचना दी।

जीवन चक्र:

अपने 45-दिवसीय जीवन चक्र में, इस कीट की मादा पत्तियों के शीर्ष पर लगभग 1,500-2,000 अंडे देती है। मोटे तौर पर 30-दिवसीय लार्वा चरण में, कैटरपिलर विकास के छह चरणों से गुजरता है। यह जीवनचक्र का सबसे खतरनाक हिस्सा है क्योंकि कैटरपिलर फसल के पौधों की पत्तियों, कोड़ों, डंठल और फूलों पर फ़ीड करता हैअब तक, भारत ने मक्का, सोरघम (ज्वार) और गन्ने की फसलों पर एफएडब्ल्यू उल्लंघन की सूचना दी है। मक्का सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है क्योंकि दक्षिणी भारत में सबसे ज्यादा मक्का उगाने वाले राज्य कीटों से प्रभावित हुए हैं। FAW उल्लंघन और सूखे के कारण उत्पादन में लगभग 5 लाख टन की कमी आई है, जिससे केंद्र सरकार को रियायती शुल्क के तहत मक्का के आयात की अनुमति मिल गई है। मक्का देश में उगाई जाने वाली तीसरी सबसे महत्वपूर्ण अनाज की फसल है और अगर समय रहते इसकी जाँच नहीं की गई तो यह कहर बरपा सकती है।


[su_highlight]NITI Aayog’s Health Index [/su_highlight]

 

प्रसंग : NITI Aayog ने “ हेल्थ स्टेट्स, प्रोग्रेसिव इंडिया ”शीर्षक से व्यापक हेल्थ इंडेक्स रिपोर्ट का दूसरा संस्करण जारी किया है।

  • विश्व बैंक से तकनीकी सहायता और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) के परामर्श से NITI Aayog द्वारा रिपोर्ट विकसित की गई है 
  • रिपोर्ट में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को उनके स्वास्थ्य के परिणामों में साल-दर-साल वृद्धिशील बदलाव के साथ-साथ एक दूसरे के संबंध में उनके समग्र प्रदर्शन के बारे में बताया गया है ।
  • इसका उद्देश्य स्वास्थ्य में राष्ट्र के प्रदर्शन की विविधता और जटिलता को मापने और समझने के लिए एक वार्षिक व्यवस्थित उपकरण स्थापित करना है ।

महत्व :

  • स्वास्थ्य सूचकांक को स्वास्थ्य परिणामों को प्राप्त करने की गति में तेजी लाने के लिए सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद का लाभ उठाने के लिए एक उपकरण के रूप में विकसित किया गया है ।
  • यह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (केंद्र शासित प्रदेशों) और केंद्रीय मंत्रालयों के लिए एक साधन के रूप में भी काम करेगा , जो वर्तमान में चल रहे अभ्यास की तुलना में वार्षिक प्रदर्शन के उत्पादन और परिणाम-आधारित माप पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है ।
  • सूचकांक के वार्षिक प्रकाशन और एक गतिशील आधार पर सार्वजनिक डोमेन पर इसकी उपलब्धता के साथ, यह सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) लक्ष्य संख्या 3 की उपलब्धि के लिए हर हितधारक को सतर्क रखने की उम्मीद है।

विभिन्न राज्यों का प्रदर्शन:

  • केरल समग्र स्वास्थ्य प्रदर्शन के मामले में शीर्ष क्रम के राज्य के रूप में उभरा है।
  • समग्र स्वास्थ्य प्रदर्शन की बात करें तो उत्तर प्रदेश सबसे खराब है।
  • गुजरात, पंजाब और हिमाचल प्रदेश चौथे, पांचवें और छठे स्थान पर रहे।
  • केरल, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र स्वास्थ्य संकेतकों में ऐतिहासिक प्रदर्शन के आधार पर शीर्ष रैंकिंग राज्यों के रूप में उभरे हैं।
  • हरियाणा, राजस्थान और झारखंड वृद्धिशील प्रदर्शन के आधार पर सूचकांक में शीर्ष पर हैं।
  • केंद्र शासित प्रदेशों में, चंडीगढ़ (63.62), दादरा और नगर हवेली (56.31), लक्षद्वीप (53.54), पुदुचेरी (49.69), दिल्ली (49.42), अंडमान और निकोबार (45.36) के स्कोर के साथ एक स्थान ऊपर उछल गया। ) और दमन और दीव (41.66)।
  • केवल लगभग आधे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने 2015-16 (आधार वर्ष) और 2017-18 (संदर्भ वर्ष) के बीच समग्र स्कोर में सुधार दिखाया।
  • आठ सशक्त कार्रवाई समूह राज्यों में, केवल तीन राज्यों – राजस्थान, झारखंड और छत्तीसगढ़ ने समग्र प्रदर्शन में सुधार दिखाया।

[su_highlight]श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन[/su_highlight]

श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन (SPMRM) एक अनूठा कार्यक्रम है, जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में विकास के लिए उत्प्रेरक हस्तक्षेप प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है

सहायता राशि:

  1. क्रिटिकल गैप फंडिंग (सीजीएफ) के रूप में दिए जाने वाले प्रत्येक रर्बन क्लस्टर के लिए अनुमानित निवेश का 30% तक का वित्त पोषण समर्थन है, जबकि 70% धनराशि राज्यों द्वारा समन्वित राज्य और केंद्रीय कार्यक्रमों और निजी निवेश के साथ अभिसरण द्वारा जुटाई जाती है। और संस्थागत वित्त पोषण।
  2. सीजीएफ अब केंद्र और राज्य के बीच सादा क्षेत्र के राज्यों के लिए 60:40 और हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 90:10 के अनुपात में साझा किया गया है।

विभिन्न प्रावधान:

मूलभूत सुविधाओं का प्रावधान – 

  • सभी घरों को 24/7 पानी की आपूर्ति का प्रावधान,
  • घरेलू और क्लस्टर स्तर पर ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन सुविधाएं

अंतर और इंट्रा गांव सड़कों का प्रावधान-

हरित प्रौद्योगिकियों का उपयोग करते हुए पर्याप्त स्ट्रीट लाइट और सार्वजनिक परिवहन सुविधाएं।

आर्थिक सुविधाओं का प्रावधान –

कृषि सेवा और प्रसंस्करण, पर्यटन, और कौशल विकास के क्षेत्रों में विभिन्न विषयगत क्षेत्र लघु और मध्यम पैमाने पर उद्यमों को बढ़ावा देने के लिए।

मिशन का उद्देश्य:

राष्ट्रीय रूर्बन मिशन (NRuM) का उद्देश्य स्थानीय आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना, बुनियादी सेवाओं को बढ़ाना और सुनियोजित रुर्बन समूह बनाना है।

ऐसे समूहों के विकास की आवश्यकता:

भारत की जनगणना के अनुसार, भारत में ग्रामीण आबादी 833 मिलियन है, जो कुल आबादी का लगभग 68% है।

  • 2001-2011 की अवधि में ग्रामीण आबादी में 12% की वृद्धि हुई है और उसी अवधि के दौरान गाँवों की निरपेक्ष संख्या में वृद्धि हुई है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों के बड़े हिस्से अकेले बस्तियाँ नहीं हैं, बल्कि बस्तियों के एक समूह का हिस्सा हैं, जो एक दूसरे से अपेक्षाकृत समीप हैं।
  • ये क्लस्टर आमतौर पर विकास के लिए क्षमता का वर्णन करते हैं, आर्थिक ड्राइवर और स्थान और प्रतिस्पर्धी लाभ प्राप्त करते हैं।
  • इसलिए, ऐसे समूहों के लिए ठोस नीति निर्देशों के लिए एक मामला बनाना; एक बार विकसित किए गए इन समूहों को ‘रुर्बन’ के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है ।

[su_highlight]जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति – 2018[/su_highlight]

संदर्भ : सरकार द्वारा अनुमोदित जैव ईंधन-2018 पर राष्ट्रीय नीति में 2030 तक पेट्रोल में इथेनॉल के मिश्रण का 20% और डीजल में जैव-डीजल के 5% सम्मिश्रण का लक्ष्य रखा गया है ।

मुख्य विशेषताएं:

वर्गीकरण : नीति जैव ईंधन को “मूल जैव ईंधन ” केरूप में वर्गीकृत करती है। प्रथम पीढ़ी (1G) बायोएथेनॉल और बायोडीजल और “उन्नत जैव ईंधन” – दूसरी पीढ़ी (2G) इथेनॉल, नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (MSW) ईंधन को छोड़ने के लिए, तीसरी पीढ़ी (3G) जैव ईंधन, जैव CNG आदि को उचित विस्तार प्रदान करने के लिए। प्रत्येक श्रेणी के तहत वित्तीय और राजकोषीय प्रोत्साहन।

कच्चे माल की स्कोप:  नीति में गन्ने के रस, चीनी चुकंदर जैसे पदार्थ, स्वीट सोरगम, स्टार्च युक्त सामग्री जैसे कि मक्का, कसावा, क्षतिग्रस्त खाद्य अनाज जैसे गेहूं, टूटे चावल, टूटे हुए चावल का उपयोग करके इथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चे माल के दायरे का विस्तार किया गया है। सड़े हुए आलू भी इथेनॉल उत्पादन के लिए योग्य।

किसानों को संरक्षण:  अधिशेष उत्पादन चरण के दौरान किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलने का खतरा है। इसे ध्यान में रखते हुए, नीति राष्ट्रीय जैव ईंधन समन्वय समिति के अनुमोदन के साथ पेट्रोल के साथ मिश्रित होने के लिए इथेनॉल के उत्पादन के लिए अधिशेष खाद्यान्न के उपयोग की अनुमति देती है।

व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण:  उन्नत जैव ईंधन पर जोर देने के साथ, नीति 1 जी जैव ईंधन की तुलना में अतिरिक्त कर प्रोत्साहन, उच्च खरीद मूल्य के अलावा 6 वर्षों में Rs.5000 करोड़ की 2G इथेनॉल बायो रिफाइनरियों के लिए एक व्यवहार्यता अंतर निधि योजना को इंगित करती है।

बायोडीजल उत्पादन को बढ़ावा:  नीति गैर-खाद्य तिलहन, प्रयुक्त कुकिंग ऑयल, लघु गर्भ फसलों से बायोडीजल उत्पादन के लिए आपूर्ति श्रृंखला तंत्र की स्थापना को प्रोत्साहित करती है।

फायदे:

आयात निर्भरता को कम करना है।

स्वच्छ वातावरण उत्पन्न करना – फसल के जलने और कृषि अवशेषों / कचरे को जैव ईंधन में परिवर्तित करने से ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में और कमी आएगी।

रोजगार सृजन – एक 100klpd 2G बायो रिफाइनरी प्लांट ऑपरेशंस, विलेज लेवल एंटरप्रेन्योर्स और सप्लाई चेन मैनेजमेंट में 1200 नौकरियों में योगदान कर सकती है।

किसानों को अतिरिक्त आय-  2 जी प्रौद्योगिकियों को अपनाकर, कृषि अवशेषों / कचरे को जो अन्यथा किसानों द्वारा जलाए जाते हैं, इथेनॉल में परिवर्तित हो सकते हैं और यदि बाजार के लिए विकसित किया जाता है तो इन कचरे का मूल्य प्राप्त कर सकते हैं।

 महत्व: विश्व स्तर पर, जैव ईंधन ने पिछले दशक में ध्यान आकर्षित किया है और जैव ईंधन के क्षेत्र में विकास की गति के साथ बना रहना जरूरी है। भारत में जैव ईंधन सामरिक महत्व का है क्योंकि यह सरकार की चल रही पहलों जैसे मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, कौशल विकास के साथ अच्छी तरह से उभरता है और किसानों की आय, आयात में कमी, रोजगार को दोगुना करने के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के साथ एकीकृत करने का शानदार अवसर प्रदान करता है।

जैव ईंधन का वर्गीकरण:

पहली पीढ़ी के जैव ईंधन  को पारंपरिक जैव ईंधन भी कहा जाता है। वे चीनी, स्टार्च, या वनस्पति तेल जैसी चीजों से बने होते हैं। ध्यान दें कि ये सभी खाद्य उत्पाद हैं। फीडस्टॉक से बने किसी भी जैव ईंधन को मानव भोजन के रूप में भी खाया जा सकता है, इसे पहली पीढ़ी का जैव ईंधन माना जाता है।

दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन  टिकाऊ फीडस्टॉक से उत्पादित होते हैं। फीडस्टॉक की स्थिरता इसकी उपलब्धता, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर इसके प्रभाव, भूमि उपयोग पर इसके प्रभाव और खाद्य आपूर्ति को खतरे में डालने की क्षमता से परिभाषित होती है। कोई दूसरी पीढ़ी का जैव ईंधन भी एक खाद्य फसल नहीं है, हालांकि कुछ खाद्य उत्पाद दूसरी पीढ़ी के ईंधन बन सकते हैं जब वे उपभोग के लिए उपयोगी नहीं होते हैं। दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन को अक्सर “उन्नत जैव ईंधन” कहा जाता है।

तीसरी पीढ़ी के जैव  ईंधन शैवाल से प्राप्त जैव ईंधन हैं। इन जैव ईंधन को उनके अद्वितीय उत्पादन तंत्र और पहली और दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन की अधिकांश कमियों को कम करने की उनकी क्षमता के कारण अपना अलग वर्ग दिया जाता है।


[su_highlight]घरेलू कामगारों पर राष्ट्रीय नीति[/su_highlight]

 

निम्नलिखित कारणों से नीति की आवश्यकता है:-

  • नियोक्ता-वर्चस्व, घरेलू कार्य उद्योग की विशेषता कम, स्थिर मजदूरी दर , बंगाली और आदिवासी श्रमिकों के लिए मजदूरी विशेष रूप से कम है।
  • नियोक्ता द्वारा मजदूरी का अनियमित भुगतान।
  • रोजगार की शुरुआत में सहमति से अधिक काम निकालना।
  • मनमाने ढंग से मजदूरी कम करने का अभ्यास।
  • नियोक्ता द्वारा प्राप्त विनियमन की निजी शक्ति।
  • नियमन की निजी प्रकृति ने नियोक्ता को भारत में घरेलू कामगार पर अर्ध-मजिस्ट्रेट शक्तियों का प्रयोग करने की अनुमति दी है।
  • श्रमिकों के काम की शर्तों को फिर से संगठित करने या इस तरह के रोजगार को छोड़ने के प्रयासों को मौखिक, और अक्सर, नियोक्ताओं द्वारा शारीरिक हमले से मना किया जाता है।
  • घरेलू श्रमिक बेरोजगारी या अपराधीकरण के लगभग पूर्ण जोखिम में हैं जब वे अपना बकाया प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

घरेलू कामगारों के लिए प्रस्तावित राष्ट्रीय नीति :-

  • इसका उद्देश्य घरेलू श्रमिकों को दुर्व्यवहार, उत्पीड़न, हिंसा से बचाना और सामाजिक सुरक्षा और न्यूनतम मजदूरी के मामले में उनके अधिकारों की गारंटी देना है। नीति में सामाजिक सुरक्षा कवर और यौन उत्पीड़न और बंधुआ मजदूरी के खिलाफ प्रावधान भी शामिल हैं।
  • यह सभी प्रकार की घरेलू मददों के लिए एक राष्ट्रीय नीति है , जिसके तहत मजदूरी का भुगतान बोर्ड को निश्चित स्लैब दरों के तहत किया जाएगा और केंद्रीय बोर्ड / ट्रस्ट को सभी हितधारकों द्वारा प्रबंधित किया जाएगा।
  • नीति का उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा कवर, रोजगार की उचित शर्तों, शिकायत निवारण और विवाद समाधान के लिए एक संस्थागत तंत्र स्थापित करना है ।
  • यह घरेलू श्रमिकों को श्रमिक के रूप में राज्य श्रम विभाग या किसी अन्य उपयुक्त तंत्र के साथ खुद को पंजीकृत करने के अधिकार के रूप में मान्यता प्रदान करता है।
  • नीति उनके लिए अपने स्वयं के यूनियनों / संघों को संगठित करने और अन्य यूनियनों / संघों के साथ संबद्ध बनाने और उनके लिए अधिकारों को भी बढ़ावा देगी । यह काम और आराम की अच्छी तरह से परिभाषित अवधि के साथ रोजगार के मॉडल अनुबंध के लिए भी प्रदान करेगा ।
  • इसका उद्देश्य नीति निर्माण के माध्यम से संबंधित सरकारों द्वारा भर्ती और प्लेसमेंट एजेंसियों को विनियमित करना है ।
  • इसमें केंद्र, राज्य और जिला स्तरों पर एक त्रिपक्षीय कार्यान्वयन समिति भी होगी  ।
  • यह  स्पष्ट रूप से विभिन्न शर्तों जैसे कि अंशकालिक श्रमिकों, पूर्णकालिक श्रमिकों, श्रमिकों, नियोक्ताओं और निजी प्लेसमेंट एजेंसियों में रहते हैं।

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